Monday, September 15, 2014

हिचकी

किस्त : 20-21

बीस

‘खेलावन मिसिर की व्यथा-कथा’ जब एक सामान्य-सी पत्रिका में छपी तो किसी ने उसका नोटिस ही नहीं लिया। लेकिन जब उसे एक लोकप्रिय कहानी-पत्रिका ने दोबारा ‘साभार’ छापा तो एक हंगामा मच गया। कहानी के संकेत इतने स्पष्ट थे कि किसी को रत्ती भर शक नहीं हो सकता था कि कहानी के प्रमुख पात्र कौन हैं।
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कहानी की शुरुआत यह भ्रम पैदा करती थी कि कहानी उस उच्चवर्गीय विश्वविद्यालय पर चोट करने के लिए लिखी गयी है, लेकिन अन्त तक पहुंचते-पहुंचते इसमें कोई सन्देह नहीं रहता था कि यह कहानी रामखेलावन नामक उस पात्र का उपहास करने के लिए लिखी गयी है। 
कहानी के चर्चित होने के पीछे परनिन्दा का यह पहलू तो था ही, आदित्य प्रकाश की चटकीली चमत्कारी भाषा-शैली का भी हाथ था। चूंकि सौरभ मिश्रा के हिमायतियों और हितचिन्तकों की भी कोई कमी नहीं थी, इसलिए इस कहानी के दोबारा छपते ही एक अच्छा-ख़ासा युद्ध छिड़ गया।
आदित्य प्रकाश से जब दिल्ली की एक चिकनी रंगीन साप्ताहिक पत्रिका में साहित्य के पन्ने देखने वाली एक उउत्फुल्लमना उपसम्पादिका ने, जो होली के त्योहार पर अपनी चुटीली हास्य-व्यंग-भरी शैली में चुटकियाँ लेने के लिए मशहूर थी, इस प्रसंग पर छोटा-सा इण्टर्व्यू लिया तो आदित्य प्रकाश ने कहा, ‘लेखक अपने इर्द-गिर्द के परिवेश से ही तो सामग्री लेता है न ? भला और कहाँ से वह सामग्री लायेगा ? वैसे, यह केवल प्रचार है कि मैंने कहानी किसी ख़ास व्यक्ति पर लिखी है। मैं तो उस उच्चवर्गीय शिक्षा संस्थान की असलियत दिखाना चाहता था।’
इस कहानी से सौरभ मिश्रा का कुछ बना या बिगड़ा, यह तो उनके मित्र ही बता सकते थे, अलबत्ता आदित्य प्रकाश का नाम उन युवा कहानीकारों में दर्ज हो गया जिन्होंने अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। इसलिए जब कुछ समय बाद आदित्य प्रकाश ने अपने सरपरस्त आई.ए.एस. कवि की छत्रछाया से बाहर आने की सोची तो उन्होंने उस सारे तन्त्र को निशाना बनाया जो मँहगी शराबें पीते हुए साहित्य और संस्कृति का जलवा राजधानी के ऐसे सभागारों और अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्रों में दिखाता था जहाँ अव्वल तो आम मध्यवर्गीय लेखक की पहुंच नहीं थी, और अगर कभी वह किसी आयोजन में शिरकत करने पहुंचता भी था तो कला-संस्कृति के किसी क्षत्रप या सेठ के दरबारी या मुसाहिब की हैसियत में। 
इस बार आदित्य प्रकाश ने अपनी कहानी के मुख्य पात्र के रूप में हिन्दी के ऐसे जाने-माने कवि को लिया जिसने शुरुआत तो अकविता की विचारशून्य अराजकता से की थी, लेकिन बहुत जल्द उससे किनारा करके अपने समय और समाज की तस्वीरें उकेरनी शुरू कर दी थीं। अकविता के अराजकतावादी दिनों में परम्परा से एक विचारशून्य विरोध सिर्फ़ कविता तक ही सीमित नहीं था, औरों से अलग नज़र आने और चौंकाने वाला कुछ करना भी इसमें शुमार था। 
लिहाज़ा, शिरीष कुमार ने अपने अच्छे-ख़ासे नाम को बदल कर शिमार कुरीष कर लिया था। बाद में जब वह अकविता के कोहरे से बाहर आया तो उसे अपनी इस बचकानी हरकत पर पछतावा भी हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और वह शिमार कुरीष के नाम से जाना जाने लगा था। औरों से अलग लीक पर चलने का ज़ज्बा अब एक नये रूप में उसके भीतर अँकुवाया था। 
जब राजधानी के अधिकांश मध्यवर्गीय हिन्दी कवि अस्सी के दशक में विद्रोह की सारी पुरानी बातें भूल कर जनता के इहलोक से पहले अपना इहलोक सुधारने की दौड़ में शामिल हो गये थे और परस्पर पीठ-खुजाऊ मण्डलियाँ बना कर पद-प्रतिष्ठा-पुरस्कार और पारितोषिक के चक्कर में कभी इस साहित्यिक गॉड फ़ादर सभी उस साहित्यिक गॉड फ़ादर के दरबार में सज्दा करने लगे थे, कुरीष ग़ाज़ियाबाद से रोज़ उस राष्ट्रीय दैनिक के दफ़्तर तक बस में अप-डाउन करता था, जिसके सम्पादकीय विभाग में वह अपने अराजतावादी दौर से बाहर निकलने के बाद बहैसियत जूनियर सह सम्पादक शामिल हुआ था। 
बीस बरस तक ख़बरों और किसिम-किसिम की रिपोर्टों और टिप्पणियों से सिर मारने के बाद अब वह सीनियर उपसम्पादक  की कुर्सी सुशोभित कर रहा था, हालाँकि बहुत-से लोगों को इस सन्दर्भ में ‘सुशोभित’ शब्द अनुपयुक्त लगता, क्योंकि कुरीष का वतीरा अब भी वैसे-का-वैसा था। समय की करवटसाज़ी के साथ जब पत्रकारिता में भगदड़ मची और पत्रकार लगभग अश्लील-सी जान पड़ने वाली तन्ख़्वाहों पर इस अख़बार से उस अख़बार में छलाँगें लगाने लगे, मानो वे पत्रकार न हों, पश्चिमी फ़ुटबॉल क्लबों में ख़रीदे-बेचे जाने वाले खिलाड़ी हों, और कुछ भाग्यशाली तो टी.वी. की नयी लालसा-उपजाऊ दुनिया के बाशिन्दे बन गये, तब भी कुरीष उसी राष्ट्रीय दैनिक में बना रहा। यों, समय-समय पर वेतन आयोगों की सिफ़ारिशों की वजह से आम तौर पर तन्ख़्वाहें बढ़ गयी थीं और पहले जैसी तंगी न रही थी, तो भी कुरीष ने न स्कूटर ख़रीदा था, न कार, और उसी तरह बस से आता-जाता रहा।    
उसकी बहुत-सी कविताओं में बसों की महिमा गायी गयी थी, दिल्ली की बसों के कुख्यात कण्डक्टरों और ड्राइवरों के दुख-दर्द और उनकी सहज मानवीयता अंकित की गयी थी, आम निम्न-मध्यवर्गीय बाबूपेशा वर्ग के जीवन और हर्ष-विषाद की छवियाँ अंकित की गयी थीं। जब भोपाल के कवि गैस काण्ड के बाद नसैनी लगा कर आकाश में चढ़ जाने की बात कहने लगे थे और दिल्ली के कवि शरीर के अनन्त स्वप्न देखने, तब कुरीष ने अपनी एक चर्चित कविता में यह कामना की थी कि वह मरे भी तो दिल्ली की बस में लटकते हुए सफ़र करता हुआ मरे।
ज़ाहिर है, अपनी इस टेक की वजह से कुरीष बहुत-से लोगों की आँख में गड़ने वाला तिनका था और उनकी खीझ अक्सर उसकी सादगी की तारीफ़ की आड़ में उसकी ‘सनकों’ का मज़ाक़ उड़ाने में निकलती थी। तभी दो-तीन घटनाएँ एक साथ हुईं। कुरीष जिस राष्ट्रीय दैनिक में काम करता था, उसके अख़बार का दफ़्तर कॉरपोरेट जगत में आ रही तब्दीलियों के चलते नॉएडा चला गया, जहाँ अख़बार के पूंजीपति मालिकों की नयी पीढ़ी की नज़र में ज़्यादा सुविधाएँ थीं। फ़ायदा यह था कि कनॉट प्लेस और बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग के युगों पुराने महँगे दफ़्तरी ताम-झाम की बजाय ज़्यादा चुस्त-दुरुस्त ढाँचा क़ायम किया जा सकेगा जो बड़ी पूँजी वाले अख़बार की काम-काजी फ़ितरत के भी ज़्यादा माफ़िक बैठता था। छिपी हुई असलियत यह थी कि ने अख़बार के पूंजीपति मालिकों की नयी पीढ़ी ज़मीनों की बेतहाशा बढ़ी हुई क़ीमतों को देख कर अपने पुरखों के कुशादा बँगलों को रफ़ा-दफ़ा करके उस पैसे को किसी और मुनाफ़ेदार धन्धे में लगाने की इच्छुक थी।    
इसी बीच कुरीष ने भी नॉएडा ही में डी.डी.ए. का एक छोटा-सा मकान किस्तों पर ख़रीदा -- एच.आई.जी. नहीं, एम.आई.जी. भी नहीं, बल्कि आर्थिक रूपसे कमज़ोर तबक़ों के लिए बनायी गयी कॉलोनी का दो कमरों वाला मकान। राहत सिर्फ़ इतनी थी कि मकान एक मंज़िला था और अपनी ही ज़मीन पर बना था, ऊपर उसे बढ़ाने की गुंजाइश थी और उसके पीछे की तरफ़ एक छोटा-सा आँगन भी था। कुरीष ने हिसाब लगाया था कि जितना किराया वह ग़ाज़ियाबाद के फ़्लैट का देता था, लगभग उतनी ही किस्त इस मकान की बैठ रही थी। 
तीसरी घटना थी कुरीष का साइकिल ख़रीदना। उस समय जब पूरी दुनिया इक्कीसवीं सदी में दाख़िल होने के लिए बेसब्री से आख़िरी दशक के बीतने की बाट जोह रही थी, हिन्दी के कवि नये कथ्य और शैली की बजाय कारों के नये मॉडलों पर बहस करने लगे थे, कुरीष का साइकिल ख़रीदना भी उसकी एक और ‘सनक’ का सबूत जान पड़ा था। 
हंगामा तो तब मचा था जब एक दिन कुरीष साहित्य अकादेमी के एक कार्यक्रम में नॉएडा से दस किलोमीटर साइकिल ही पर चला आया था। इसी साइकिल को ले कर आदित्य प्रकाश ने अपनी ख़ास चुलबुली शैली में, जिसे आम तौर पर मार्केज़ के जादुई यथार्थवाद का हिन्दी क्लोन कहा जाता था, एक नयी कहानी लिखी थी ‘मारीच चीमरा की साइकिल।’ 
इस कहानी में भी ज़ाहिरा तौर पर आदित्य प्रकाश ने दिल्ली की उन उच्चवर्गीय संस्थाओं, हाई-फ़ाई सभागारों और संस्कृति के उठाईगीरों पर चोट करने की कोशिश की थी, लेकिन अपनी मुकम्मल शक्ल में उनकी कहानी कुरीष का एक कैरीकेचर बन कर रह गयी थी।
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इधर उनकी एक ताज़ा कहानी हिन्दी की एक जानी-मानी कहानी पत्रिका में धारावाहिक रूपसे छप रही थी -- ‘क्लोज़ अप की मुस्कान वाला लड़का’ जिसमें उन्होंने एक दक्षिण भारतीय युवक और एक कश्मीरी लड़की की प्रेम-कथा को बड़े ऐन्द्रिक, लगभग रीतिकालीन श्रृंगार कविताओं की-सी शैली में पेश किया था और कहानी में आर्य-द्रविड़ तनाव से ले कर पर्यावरण, आर्थिक उदारीकरण, कॉरपोरेट जगत, शेयर बाज़ार और भूण्डलीकरण सब कुछ पिरो दिया था। 
दिलचस्प बात यह थी कि प्रेमचन्द की विरासत के गुन गाने वाले हिन्दी के नये-पुराने कहानीकारों को अब सच के सीधे-सीधे बयान में कोई तुक नज़र नहीं आता था। प्रेमचन्द अब उन्हें इकहरे यथार्थ के कथाकार जान पड़ते थे। अपने घर से बाहर निकलते ही एक औसत हिन्दुस्तानी का सामना पैसे और ताक़त के जिस खुले और निर्मम खेल से होता था, घूसख़ोरी और अपराध पर टिके जिस राजनैतिक तन्त्र से होता था उसका अक्स बिरले ही किसी कहानी या उपन्यास में नज़र आता। 
ऐसी हालत में आदित्य प्रकाश की चमकीली भाषा, उनकी कहानियों में तनाव और ऐन्द्रिकता का मसाला और बुराइयों पर चोट करने के मिस उनका एक जुगुप्सा-भरा चित्रण बहुत-से लोगों को रुच रहा था और उनका बेबाक अन्दाज़ और भी बेबाक होता जा रहा था। कहानियों में भी और जीवन में भी।
अपनी इसी बेबाक अदा से उन्होंने ‘अरे भाई, नन्दूजी हैं क्या?’ कहते हुए दरवाज़ा ठेला था और बिहार से आये तीनों कॉमरेडों को अपनी अर्दल में लिये अन्दर आये थे।



इक्कीस

इस बीच चन्दू गुरु चाय ख़त्म कर चुके थे और जेब से एक नफ़ीस-सा देसी बटुआ निकाल कर, उसकी डोरी खींच, सुपारी और कत्थे के डले निकाल कर हथेली पर रख रहे थे। जिस बीच आदित्य प्रकाश और दूसरे लोगों ने बैठक में रखे मूढ़ों को सरका कर जगह बनाते हुए आसन जमाया, पण्डित चन्द्र किशोर तिवारी सुपारी, कत्था, चूना, लौंग मिला कर गुटका बनाते रहे, फिर उन्होंने उसकी एक फंकी लगा कर एक छोटी-सी डिबिया से चुटकी भर तम्बाकू मुंह में डाला और दीवार से टेक लगा कर थोड़ा इतमीनान से टिक गये।
‘मैंने आज सुबह जब कल की रैली के बारे में बधाई देने के लिए पार्टी ऑफ़िस फ़ोन किया,’ अदित्य प्रकाश ने नन्दू जी को सम्बोधित करते हुए, लेकिन जैसे किसी सभा को सुनाते हुए कहा, हालाँकि कमरे में नन्दू जी के भाई और बिहार से आये उन तीन कॉमरेडों के अलावा और कोई नहीं था, ‘तो साथी प्रकाशपुंज ने बताया कि नन्दू जी की तबियत ख़राब है। शायद आपकी पत्नी ने वहाँ फ़ोन किया था। बहरहाल, ज़्यादा-कुछ तो पता नहीं चला, इसलिए और भी चिन्ता हो गयी। साथी लोग तो आ ही रहे थे, हमने कहा, हम भी नन्दू जी से मिलते आयें। आख़िर, हमारे नये संग्रह का दारोमदार तो नन्दू जी के कन्धों पर ही है।’
इतना सब एक ही साँस में कह कर आदित्य प्रकाश बैठक में रखे मूढ़ों में से एक पर इत्मीनान से टिक गये और उन्होंने बैठक में चारों तरफ़ निगाह दौड़ायी। उनके साथ आये पार्टी कॉमरेड पहले ही से नन्दू जी की बैठक और उसमें लगी संस्कृति की नुमाइश का नज़ारा कर रहे थे। एक साथ इतनी कला को देख कर उन्हें बस यही महसूस हो रहा था कि नन्दू जी ने सम्पन्नता की (और संस्कृति की भी) कई सीढि़याँ एकबारगी तय कर ली हैं। रहे आदित्य प्रकाश तो उनका कहानीकार सहसा जागृत हो गया था और वे एक-एक ब्योरे को मन में बिठाते जा रहे थे।
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, जिसमें नन्दू जी की हिचकियों ही की आवाज़ सुनायी देती रही, आदित्य प्रकाश ने फ़ैसलाकुन अन्दाज़ में कहा, ‘बैठक तो आपने ख़ूब सजायी है। जगह भी यह कुसुम विहार से अच्छी है। सबसे बड़ी बात है कि आपके दफ़्तर के नज़दीक है।’
नन्दू जी इतने निढाल थे कि इस पर एक फीकी-सी मुस्कान के अलावा और कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर पाये, लेकिन अनिल वज्रपात ने फ़ौरन टीप जड़ी, ‘साथी, रघुवीर सहाय एक कविता में लिखे हैं जहाँ बहुत कला होगी वहाँ परिवर्तन नहीं होगा। जेतना सादगी होगा, कला ओतना ही कारगर होगा।’
‘ई बात में थोड़ा दम तो है, कॉमरेड,’ नालन्दा के किसान सभाई राम अँजोर बोले। ‘सब कला समाजिक परितवर्तन का औजारै तो है। कला कला के लिए का सिद्धान्त तो बहुत पहले ही खारिज कर दिया गया रहा।’
‘लेकिन जिस आदर्श की आप बात कर रहे हैं, कॉमरेड,’ आदित्य प्रकाश बोले, ‘उस तक पहुंचने में अभी समय लगेगा। यह संक्रान्तिकाल है, इसमें हम मध्यवर्गीय लोग तरह-तरह के चरणों से गुज़रेंगे और इसी क्रम में उस सहजता को हासिल करेंगे जिसकी तरफ़ आप इशारा कर रहे हैं। जैसा कि अभी आते समय भी चर्चा हो रही थी, एक वर्ग विभाजित समाज में लोगों की चेतना भी लामुहाला विभाजित होगी और.......’
इस सारी बहस से नन्दू जी का मन बेतरह ऊबने लगा था। उन्हें अपने साथियों की यही बात बहुत बुरी लगती थी। वे मौक़ा-मुहाल देखते नहीं थे और सिद्धान्त झाड़ने में जुट जाते थे। कई बार वे सोचते, इस तीसरी धारा को भी तो अब पैंतीस-चालीस साल हो चले थे, अब तक तो कुछ ठहराव आ जाना चाहिए था ‘वसन्त का वज्रनाद’ वालों में। पार्टी बनी थी, टूटी थी, लगभग मिट गयी थी, फिर राख से जन्म लेने वाले पौराणिक पक्षी की तरह उठ खड़ी हुई थी, और अब तो खुले में जा कर चुनावों में भी भाग लेने लगी थी, मगर समस्या शायद पार्टी में उतनी नहीं थी जितनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में, सवाल पार्टी की उमर का नहीं, साथियों की उमर का था। और वह भी शारीरिक से ज़्यादा दिमाग़ी उमर का।
तभी आदित्य प्रकाश की नज़र वहीं चटाई पर बैठे और दीवार से टेक लगाये नन्दू जी के बड़े भाई की तरफ़ गयी। उन्होंने नन्दू जी की तरफ़ देखते हुए पूछा, ‘नन्दू जी, आपने इनसे परिचय नहीं कराया। आप....’
‘मेरे बड़े भाई हैं, चन्द्र किशोर तिवारी,’ नन्दू जी ने कहा।
‘अच्छा-अच्छा, नमस्कार,’ आदित्य प्रकाश सिर को हल्का-सा झुकाते और हाथ जोड़ने की-सी मुद्रा बनाते हुए बोले। ‘यहीं दिल्ली में हैं आप, या...’
‘दिल्लियै में हैं। उधर ओखला साइड में। एक फ़ैक्टरी में स्टोर कीपर हैं।’ चन्दू जी ने संक्षेप में बात निपटा दी। वे अपने भाई के इन साथियों की फ़ितरत भाँप गये थे।
लेकिन आदित्य प्रकाश इतनी जल्दी झटके जाने को तैयार नहीं थे। ‘तो नन्दू जी को देखने आये होंगे आप? वैसे देखने में आप स्टोर कीपर नहीं, पूजा-पाठ कराने वाले पण्डित लगते हैं। कुछ इसमें भी विश्वास है आपका?’
‘काहे नहीं होगा, साहेब,’ चन्दू जी का ब्राह्मणत्व जाग उठा। ‘बिस्वास में बहुत ताक़त है। सन्त लोग कह गये हैं बिस्वास के बल पर पंगु गिरि लाँघ जाते हैं, बधिर को सुनायी देने लगता है ।’
‘तो नन्दू जी को आप कौनो उपाय बताये कि नहीं, ई हिचकी को ठीक करने का?’ बीड़ी निकालते हुए अनिल वज्रपात ने पूछा।
‘हम को जो जनाता था, सो हम कर दिये हैं, सीधा-सीधा प्रेत-बाधा का लच्छन है,’ चन्दूजी बोले।
‘प्रेत-बाधा ?’ कॉमरेड प्रकाशपुंज भड़क कर कोई तीखी बात कहने ही वाले थे कि आदित्य प्रकाश ने बात का सिरा थाम लिया।
‘साथी, सब खेल नयी-पुरानी शब्दावली का है।’ वे बोले, ’जिसे पुराने लोग प्रेत-बाधा कहते थे, उसे आज की भाषा में मनोविकार भी कहने लगे हैं। ये सब ऐंग्ज़ाइटी सिंड्रोम और तरह-तरह की मनोग्रन्थियाँ पहले एकजुट करके प्रेतबाधा कह दी जाती थीं।’
इस बीच वज्रपात इस चर्चा से ऊब कर बीड़ी को नाख़ून पर ठोंकते हुए बारजे पर चले गये थे। उन्होंने बीड़ी सुलगायी, दो-चार कश लगाये और इत्मीनान से नन्दूजी के घर का मुआयना किया। उन्हें चाय की तलब लग रही थी। वहीं टहलते हुए उन्होंने रसोई की तरफ़ झाँका कि ‘भाभी जी’ दिखें तो चाय की फ़रमाइश की जाय। ‘भाभी जी’ तो दिखीं नहीं, अलबत्ता उन्होंने रसोई में रखी गैस और उसके बाहर बारजे के घिरे हुए हिस्से में रखा फ़्रिज और वॉशिंग मशीन ज़रूर देख ली।
अन्दर चन्दू जी, जिनका ब्रह्मतेज अब तक जागृत हो गया था, अपने फ़ॉर्म में आ गये थे। 
‘देखिए, आप सब लेखक-कलाकार लोग हैं,’ वे बोले, ‘हम आप लोग के बराबर पढ़े-लिखे तो नहीं हैं, मुदा थोड़ा-बहुत सास्तर-ज्ञान हमहूं प्राप्त किया है। ई जो प्रकृति है इसमें सब पदार्थ या तो जड़ है या चेतन। एतना ही नहीं, ई सब आपस में टकराता भी रहता है। का कहते हैं आप लोग सब, हाँ, द्वन्द्वात्मकता। तो ई भौतिक जगत में सब खेल जड़ और चेतन के संघर्ष का है। एही से सब परगति भी होता और बिकार भी फैलता है। आप लोग अपना उपाय लगाते हो, हम लोग अपना। उद्देस एकै है, बिकार दूर करना।’
चन्दू जी कुछ इतने विश्वास से बोल रहे थे कि न तो आदित्य प्रकाश को बीच में कहने का कुछ मौक़ा मिला, न प्रकाशपुंज या नालन्दा के राम अँजोर को। यह प्रवचन अभी जारी रहता, मगर अनिल वज्रपात के अन्दर आते ही एकबारगी रुक गया, क्योंकि चाय से तलबियाये कॉमरेड ने, बिना इस बात का ख़याल किये कि वहाँ कितनी गूढ़ चर्चा चल रही थी, छूटते ही कहा, ‘अरे नन्दू जी, कुछ चाय-ओय पिलवाइएगा कि नहीं ? घरवा तो खूब टिच-टाच कर लिये हैं आप। गैस, फ़्रिज, वासिंग मसीन। आराम का सब्बे चीज है। वासिंग मसीन नया लिये हैं आप, ऐसा जनाता है?’
नन्दू जी को समझ नहीं आया कि वे वॉशिंग मशीन लेने पर ग्लानि महसूस करें या गर्व। वे बुदबुदाते हुए कुछ कहने ही वाले थे कि अन्दर से बिन्दु ऑँचल से हाथ पोंछती हुई बाहर आयी। यह साफ़ नज़र आ रहा था कि जिस बीच इधर बैठक में ज्ञान-चर्चा हो रही थी, वह साथियों के आने से मिली फ़ुरसत का फ़ायदा उठा कर नहा रही थी। चूंकि वह सबसे पहले ही से परिचित थी, इसलिए उस झमेले में समय ज़ाया न करके उसने सीधे सवाल किया था, ‘कॉमरेड रामजी यादव भी तो आने वाले थे। वे नहीं आये?’
‘दिल्ली कमेटी का मीटिंग चल रहा है, रैली का समीक्षा करने का खातिर। ओही में फँसे हैं। बोले हैं, बाद में टाइम मिलेगा तो आयेंगे,’ जवाब किसान सभाई राम अँजोर जी ने दिया था।
‘रैली तो सुनते हैं, बहुत अच्छी हुई,’ बिन्दु ने पूछने के अन्दाज़ में कहा।
लेकिन कॉमरेड वज्रपात इन सब बातों में अभी सिर खपाने के मूड में नहीं थे, उन्होंने अपने मुंहफट अन्दाज़ में कहा, ‘ऊ सब बात भी होगा, भाभी जी, फिलहाल तो चाय पिलाइए। दिल्ली का ई सब लेफ़्ट-राइट में चाय का तलब बहुत लगता है।’
‘अभी बनाते हैं चाय। हम ज़रा नहाने चले गये थे, नहीं तो चाय पहले ही मिलती,’ यह कह कर बिन्दु चाय बनाने के लिए रसोई की ओर बढ़ी। अचानक उसकी नज़र चन्दू जी पर पड़ी और उसने पूछा, ‘आपके लिए भी लाऊँ भैया?’
‘नहीं, नहीं, अबहिन तो पिये हैं,’ चन्दू जी बोले। फिर उन्होंने सहसा घड़ी की तरफ़ देखा और उठ खड़े हुए, ‘बारह बज गया है। आज हमको सेठ बदरी प्रसाद दुबारा बुलायेन हैं। संझा को हुआँ फिर जाना है। अउर अभी करोल बाग के लाला हरदयाल चोपड़ा का काम बाक़ी है।’
यह कह कर चन्दू जी ने तत्परता से अपना झोला उठाया और उसमें से गंगाजल की बोतल निकाल कर बिन्दु को थमा दी। ‘एका तुम्हीं रखो, घण्टे-घण्टे पर एक चम्मच नन्दू को पिलाय देना। बड़ी-बड़ी दवाइयन से गंगाजल में बहुत ताकत होती है। अउर ई तो सुद्ध है, पिछली बार हम माघ में संगम नहाये गये थे तब हुंअई से लाये रहे।’ फिर वे नन्दू की तरफ़ मुड़े थे, ‘ईस्वर ने चाहा तो संझा नहीं तो रात तक आराम आ जायेगा! धियान रखना अऊर हमका खबर करवाये देना।’

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